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Friday, 14 April 2017

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jabalpur: तत्कालीन आरएमओ डॉ. मुरली अग्रवाल के कार्यकाल में विक्टोरिया में लाखों का बिस्किट घोटाला

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जबलपुर, न्यूज ट्रैप। घपले-घोटाले में स्वास्थ्य महकमे का कोई जोड़ नहीं है। खासकर जबलपुर के सरकारी और गैर सरकारी स्वास्थ्य महकमे में जिस तरह की धांधली और भ्रष्टाचार है, उसने सभी हदों को पार कर दिया है। जबलपुर में सीएमएचओ यानि मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की कुर्सी पर ऐसा व्यक्ति बैठा है, जिसे इस पद की पात्रता ही नहीं है। शासन के नियम-कानून के विपरीत कुर्सी पाई गई है। इतना ही नहीं विक्टोरिया अस्पताल में लाखों रूपए का बिस्किट घोटाला हुआ है, जिसमें शासन से बिना आवंटन मिले, बिना किसी आदेश व परमीशन के ३.२९ लाख रूपए के सोया बिस्किट खरीद लिए गए। इन बिस्किटों को एक्सपायरी तिथि के अंतिम पड़ाव तक में वितरित किया गया जबकि वे उस समय खाने योग्य नहीं थे। सूत्रों का कहना है कि सोया बिस्किट की फर्जी खरीदी हुई है। पूरी खरीदी कागजों में की गई है और रकम हजम कर ली गई।
>धांधली के बिस्किट
मामला वर्ष २००८ का है उस समय आरएमओ डॉ. मुरली अग्रवाल थे। विक्टोरिया अस्पताल के सूत्रों ने सहायक संचालक कोष लेखा एवं पेंशन जबलपुर संभाग की एक जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि सिविल सर्जन कार्यालय ने वर्ष २००८ में मरीजों के लिए ३ लाख २९ हजार ६७० रू. के सोया बिस्किट भोपाल की गेटव्हेल मेरी प्रोडक्ट फर्म से खरीदे। ये खरीदी अस्पताल के भोजन व्ययमद की राशि में अनियमितता कर की गई।
एक्सपायरी डेट के आसपास की गई खरीदी
सूत्रों का कहना है कि सोया बिस्किट एक्सपायरी डेट के एकदम करीब खरीदे गए। भंडार पंजी (रजिस्टार) की जांच में पाया गया कि कार्यालय में २७ मार्च २००८ को बिस्किट आए, जिनका वितरण 1 अप्रैल से २२ दिसम्बर तक किया गया। एक्सपायरी तिथि के आखिरी दौर तक में बिस्किट बांटे गए जबकि उस वक्त ये बिस्किट खाने योग्य नहीं बचे थे।
बिस्किट की फर्जी खरीदी
सूत्रों का दावा है कि सोया बिस्किट की फर्जी खरीदी दर्शाई गई। इनकी खरीदी कागजों तक ही सीमित रही। फर्जी खरीदी व वितरण दर्शाकर पूरी रकम अंदर कर ली गई। सूत्रों का कहना है कि इस मामले में ऑडिट ने भी आपत्ति की थी, लेकिन तब भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
जांच में पकड़ी धांधली
विक्टोरिया बिस्किट घोटाले की जांच सहायक संचालक कोष, लेखा एवं पेंशन ने की, जिसमें पाया गया कि सोया बिस्किट की आवश्यकता से अधिक खरीदी बगैर बजट प्रावधान के की गई है। सोया बिस्किट की ऐसी खरीदी का कारण भोजन व्यय मद की राशि, अनुदान को लैप्स होने से बचाना था। जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह वित्तीय औचित्य के मानक सिद्धांत का उल्लंघन एवं म.प्र. कोष संहिता भाग एक सहायक नियम २८४ के अनुसार एक गंभीर अनियमितता है।
जोड़तोड़ से बन गए सीएमएचओ
मप्र शासन लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के आदेश क्रमांक एफ-१-०/२००३/१७/मेडि-१ आदेश दिनांक ३०/१२/२००३ के मुताबिक मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी का पद नियमानुसार विशेषज्ञ डी.एच.ओ. के वरिष्ठता आधार पर दिए जाने की विभाग की नीति है। उक्त आदेश मप्र. शासन के लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की तत्कालीन अवर सचिव आर.सी. सक्सेना ने जारी किए थे। लेकिन जबलपुर जिले में सीएमएचओ पद पर डॉ. मुरली अग्रवाल की ताजपोशी में शासन के उक्त नियम कायदों के कोई मायने नहीं रहे। डॉ. मुरली अग्रवाल से कई सीनियर डॉक्टर बैठे रह गए और मुरली अग्रवाल को सीएमएचओ की कुर्सी मिल गई। बहुत से सीनियर डॉक्टर तो इस पद का इंतजार करते-करते रिटायर तक हो गए।
छत्तीसगढ़ तबादले से वरिष्ठता घटी
डॉ. मुरली अग्रवाल का वर्ष २००२ में छत्तीसगढ़ तबादला हुआ था। मगर तब भी वे विक्टोरिया में ही डटे रहे। वर्ष २००२ से २००९ तक उन्होंने शासन से वेतन भी लिया, जो नियम-विरूद्ध था। तबादले के बाद उन्हें विक्टोरिया से कार्यमुक्त भी कर दिया गया था, लेकिन उन्होंने इस सबकी कोई परवाह नहीं की। छग तबादले के बाद वे म.प्र. राज्य के कर्मचारी नहीं रह गए थे। ऐसे में उनकी वरिष्ठता भी कम हो गई थी। इसके बावजूद वे जोड़तोड़ से सीएमएचओ बन गए।
डॉ. जे.एल. मिश्रा के करीबी हैं सीएमएचओ
जबलपुर के संपूर्ण स्वास्थ्य महकमे में चर्चा है कि डॉ. मुरली अग्रवाल, भोपाल में बैठे डायरेक्टर स्वास्थ्य सेवाएं डॉ. जे.एल.मिश्रा के बेहद करीबी बताए जाते हैं। डॉ. जे.एल. मिश्रा की उन पर विशेष मेहरबानी है। डॉ. जे.एल. मिश्रा जबलपुर में संयुक्त संचालक स्वास्थ्य सेवा रह चुके हैं। उनका पूरा कार्यकाल विवादों से घिरा रहा है।
म्युचुअल ट्रांसफर का भोपाल में रिकार्ड नहीं
सूत्रों का कहना है कि सीएमएचओ डॉ. मुरली अग्रवाल ने वर्ष २००९ मे आपसी स्थानांतरण से मप्र में वापसी की, लेकिन इसका कोई रिकार्ड भोपाल में उपलब्ध नहीं है। सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत इस संबंध में जानकारी मांगी गई, जिसके जवाब में कहा गया कि कोई जानकारी नहीं है। वास्तव में यह हैरत में डालने वाली बात है। म्युचुअल ट्रांसफर के निर्णय में शीर्ष अधिकारियों की टीम की भागीदारी रहती है। ऐसे में स्वास्थ्य महकमे भोपाल में इसकी कोई जानकारी या रिकार्ड न होना, तमाम संदेहों को जन्म देता है।
>राज्य आर्थिक अपराध में लंबित जांचे
डॉ. मुरली अग्रवाल के खिलाफ राज्य आर्थिक अपराध ब्यूरों में मामले दर्ज हैं जिनकी जांचें लंबित पड़ी हैं। वर्ष २००८ में एसपी राज्य अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने रोगी कल्याण समिति के भ्रष्टाचार के एक मामले में जांच करते हुए डॉ. मुरली अग्रवाल की विभागीय जांच की अनुशंसा की थी। वर्तमान सिविल सर्जन डॉ. ए.के.सिन्हा ने भी अपने बयान में न्यूज ट्रैप को बताया था कि ईओडब्ल्यू ने डॉ. मुरली अग्रवाल की विभागीय जांच की अनुशंसा की थी। सूत्रों का कहना है कि जान बूझकर जांच को पूरी नहीं होने दिया जा रहा है। इसमें भी सैटिंग का खेल चल रहा है।
>डॉ. मुरली अग्रवान की पूरी नौकरी विक्टोरिया में
डॉ. मुरली अग्रवाल का सर्विस रिकार्ड खुद बताता है कि उन्होंने अपनी पूरी नौकरी विक्टोरिया में ही की है। वे विक्टोरिया में ही एक्सरे सोनोग्राफी विभाग के मुखिया थे। उसके बाद वे आरएमओ बने और फिर एक झटके में सीएमएचओ बन गए।
>प्रभारी एसपी से सीधी बात
राज्य आर्थिक अपराध ब्यूरो में मामले तो दर्ज हैं लेकिन जांच की प्रगति की जानकारी स्टेनों से ही पूछकर दे पाऊंगा।
आर.एस.रावत, प्रभारी एसपी, राज्य आर्थिक अपराध
सवाल- तो स्टेनो से आप पूछ लें।
जवाब-स्टेनों आफिस में नहीं है। कहीं गया है।
सवाल-तो आप फोन पर पूछ लें।
जवाब-आ जाने दो। फिर पूछ लेंगे।
सवाल-कब तक आएगा स्टेनों?
जवाब-पता नहीं।
इसी बीच प्रभारी एसपी थोड़ी देर रूकने के बाद खुद ही चले गए।

लिखित शिकायत आने दो, कार्रवाई की जाएगी।
शरद जैन, स्वास्थ्य राज्यमंत्री
सवाल-मामला तो आपके संज्ञान में आ चुका है?
जवाब-कार्रवाई की जाएगी।
सवाल-कब की जाएगी?
जवाब-कार्रवाई करेंगे।

साभार न्यूज़ ट्रैप (साप्ताहिक)

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