नर्मदा सेवा यात्रा के लिए बनकर तैयार हुआ मदांगन घाट
रायसेन। मोक्ष दायिनी, पुण्य सलिला मॉं नर्मदा ने अपने उदगम स्थल से लेकर समुद्रागम तक इस धरां को न केवल पल्लवित, पोषित किया है, बल्कि युगों-युगों से मानव सभ्यता और संस्कृृति को जीवन्त बनाए हुए है। मध्यप्रदेश की जीवन रेखा मॉं नर्मदा ने अपने अविरल प्रवाह पथ में जिस भूमि को स्पर्श किया है उस भूमि को उर्वर और पावन है। मॉं नर्मदा के प्रति जनमानस की अगाद्य आस्था और श्रद्धा, नर्मदा के तट पर पडऩे वाले विभिन्न घाटों पर प्रतिबिम्बित होती है।
मॉं नर्मदा तट के घाटों का पौराणिक महत्व पुराणों तथा अनेक धार्मिक ग्रन्थों में मिलता है। प्रत्येक घाट का अपना एक धार्मिक महत्व है। अनेक घाटों को हमारे ऋषि-मुनियों, संतो-महंतो तथा योगियों ने अपनी साधना स्थली बनाकर उन्हें दिव्यता प्रदान की है। रायसेन जिले के भी अनेक घाटों का अपना पौराणिक महत्व है। इन्हीं घाटों में भारकच्छकलां का अपना विशेष महत्व है। नर्मदा पुराण रेवा खण्ड के 181/1.2 में इस तीर्थ स्थल का वर्णन है। पौराणिक मान्यता एवं लोकश्रुति के अनुसार यह मान्यता प्रचलित है कि इस स्थान पर महर्षि भृगु ने भगवान शिव की साधना की थी। भगवान शिव ने साधनारत महर्षि भृगु की परीक्षा के लिए अपने नंदी को भेजा था। महर्षि भृगु की साधना स्थली होने के कारण इस स्थान का नाम भृगुकच्छ तीर्थ पड़ा जो कालांतर में भृगुकच्छ शब्द का अपभ्रंश भारकच्छकलॉ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह भी मान्यता है कि यहां मंदागिनी गंगा का नर्मदा में समागम हुआ है।
नमामि देवी नर्मदे-नर्मदा सेवा यात्रा के लिए बाड़ी विकासखण्ड के भारकच्छकलॉ स्थित मदांगन घाट को तैयार किया गया है। मदांगन घाट में नर्मदा सेवा यात्रियों के लिए स्थान एवं पूजन के अनुरूप व्यवस्थाएं की जा रही हैं। इस घाट का निर्माण कार्य लगभग पूर्ण हो गया है तथा यह उत्तम स्थिति में है

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