खान अब्दुल गफ्फार खान (बच्चा खान उर्फ़ बादशाह खान) 1880 में जन्मे एक ऐसे राजनेता थे जिन्होंने अपनी नीतिपरक सोच और सच्चाई के बल पर अंग्रेजो की नाक में दम कर दिया था। इन्होने कभी भी हिंसा का साथ नहीं दिया और यही वजह है आगे चलकर इन्हें फ्रंटियर गाँधी के नाम से भी पुकारा जाने लगा।
महात्मा गाँधी के सिद्धांतो से प्रेरित फ्रंटियर गाँधी ने 1920 में 'खुदाई खिदमतगार' नमक संगठन की स्थापना की। खुदाई खिदमतगार एक फारसी शब्द है जिसका हिन्दी में अर्थ होता है ईश्वर की बनाई हुई दुनिया के सेवक।
बादशाह खान ने अपना पूरा जीवन अहिंसा और सहनशीलता की नीव पर रखा और यह सन्देश दूसरो तक पहुचाया की अहिंसा के ताकत के आगे कोई भी बुरी शक्ति टिक नहीं सकती। खान अब्दुल गफ्फार खान मोहनदास गाँधी के प्रिये मित्र होने के साथ साथ इस्लाम के बहुत बड़े अनुयायी थे। उनके अनुसार सच्चा मुसलमान वही है जो कुरान के लिखे 'जिहाद' शब्द की गहराई को समझता है। जिहाद: अध्यात्मिक संघर्ष, जिहाद का सही अर्थ है अपने अन्दर की बुराई को ख़तम करना और आस पास हो रहे अन्याय से लड़ना, जिसके लिए बिलकुल गलत है अगर हम तलवार उठाते हैं।
इन्होने सरहद पर रहने वाले उन पठानों को रास्ता दिखाया, जिन्हें हमेशा 'लड़ाके' के तौर पर दर्शाया गया था। नमक सत्याग्रह के दौरान गफ्फार खान की गिरफ़्तारी के बाद खुदाई खिदमतगार ने एक जुलूस निकाला, जिसके चलते अंग्रेजी प्रशासन ने उनपर गोलियां बरसना शुरू कर दिया और देखते ही देखते 200 से 250 लोग मारे गए पर प्रतिहिंसा नहीं हुई। यह कमाल गफ्फार खान के करिश्माई नेतृत्व का था।
मुस्लिम लीग द्वारा देश के विभाजन की मांग का बहुत विरोध किया परन्तु जब विभाजन स्वीकार कर लिया गया, खान बहुत निराश हुए और पाकिस्तान में रहकर 'पख्तूनिस्तान' नामक स्वायात्व प्रशानिक इकाई की मांग करते रहे। जिस कारण पाकिस्तान में इनका जीवन अक्सर जेल में ही गुज़रा।
गफ्फार खान ने पूरी ज़िन्दगी अहिंसा में अपना विश्वास बनाए रखा। ये एक मात्र पाकिस्तानी थे जिन्हें भारत के सर्वोच्य नागरिक सम्मान भारत रतन से सम्मानित किया गया। इनके निधन (1988) पर लाखो लोगों ने एक साथ जुटकर इन्हें अंतिम विदाई दी। आज के युग में जब हर तरफ अन्याय फैला हुआ है यह बहुत ज़रूरी है की फ्रंटियर गाँधी के जीवन से हम कुछ सीख लें और मानवता हित के लिय सोचे तथा कार्य करे।

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