बजट को खराब या अच्छा कहना ठीक नहीं होगा, बल्कि इसे मिली-जुली संभावनाओं का पिटारा कहा जाना चाहिए। पहले अच्छी चीजों पर बात करें तो टैक्स में राहत आम लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगी।
आयकर सीमा बढ़ने से राहत: आयकर सीमा 3 लाख करने व अन्य स्लैब में राहत मिलने से मध्यम वर्ग सकारात्मक रूप से प्रभावित होगी। कृषि के लिए बजट में विशेष प्रावधान हुआ, ग्रामीण विकास पर जोर दिया गया, सारे गांवों तक विद्युत आपूर्ति करने की बात आई। इन्हें हम बजट का सकारात्मक पहलू कह सकते हैं।
रोडमैप जरूरी: रेल, सड़क और उड्डयन क्षेत्र को एकसाथ जोड़ने, इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने पर बात हुई और रियल एस्टेट के लिहाज से यह बजट बेहद लुभावना है। मगर मोटी बात यह है कि बजट में केवल योजनाएं बना देना या पैसे का इंतजाम कर देना काफी नहीं, इनका रोडमैप भी होना चाहिए, जो इस बजट में नहीं दिखा।
रोजगार पर नहीं हुई बात: हर साल देश में तकरीबन 1 लाख करोड़ का खाद्यान्न सड़ता है, क्योंकि हमारे पास इसे स्टोर करने की क्षमता कम है। बजट में इसे बढ़ाने की बात न तो बीते वर्ष हुई न इस बार।
कृषि आधारित देश में बीते तीन वर्षों में क्रमश: केवल 1.5, 0.5 व 1.2 की वृद्धि कृषि क्षेत्र में दर्ज की गई और यह चिंता का विषय है। 100 गांवों तक बिजली पहुंचाने का वादा बजट में हुआ है लेकिन बिजली उत्पादन कैसे बढ़ेगा, इस विषय में नहीं बताया गया। युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने पर भी बात नहीं हुई।
बार-बार बदलाव गलत: यूजीसी से शिक्षण संस्थानों को मान्यता के नियमों में बदलाव करने के बारे में कहा गया लेकिन मुङो लगता है कि बार-बार बदलाव करने से गुणवत्ता प्रभावित होती है। किसी एक पॉलिसी पर कम से कम 5 साल काम करके देखना चाहिए। केन्द्र ने पहले बजट में मनरेगा का विरोध किया और इस बार उसका बजट 8 हजार करोड़ रुपये बढ़ा दिया गया।
इस तरह की योजनाएं ग्रामीण उद्यम पर असर डालती हैं और ग्रामीण मजदूरी से ऊपर नहीं उठ पाते। इसी तरह महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य, युवाओं के लिए रोजगार पैदा करने, खेल व विद्युत उत्पादन जैसे मुद्दे बजट में अछूते रह गए हैं।
कृषि आधारित देश में बीते तीन वर्षों में क्रमश: केवल 1.5, 0.5 व 1.2 की वृद्धि कृषि क्षेत्र में दर्ज की गई और यह चिंता का विषय है। 100 गांवों तक बिजली पहुंचाने का वादा बजट में हुआ है लेकिन बिजली उत्पादन कैसे बढ़ेगा, इस विषय में नहीं बताया गया। युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने पर भी बात नहीं हुई।
बार-बार बदलाव गलत: यूजीसी से शिक्षण संस्थानों को मान्यता के नियमों में बदलाव करने के बारे में कहा गया लेकिन मुङो लगता है कि बार-बार बदलाव करने से गुणवत्ता प्रभावित होती है। किसी एक पॉलिसी पर कम से कम 5 साल काम करके देखना चाहिए। केन्द्र ने पहले बजट में मनरेगा का विरोध किया और इस बार उसका बजट 8 हजार करोड़ रुपये बढ़ा दिया गया।
इस तरह की योजनाएं ग्रामीण उद्यम पर असर डालती हैं और ग्रामीण मजदूरी से ऊपर नहीं उठ पाते। इसी तरह महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य, युवाओं के लिए रोजगार पैदा करने, खेल व विद्युत उत्पादन जैसे मुद्दे बजट में अछूते रह गए हैं।

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