तमिलनाडु में जलीकट्टू आदोंलन को कानूनी तौर पर मान्यता मिलने के बाद अब सूबे में छात्रों, कलाकारों औऱ नेताओं ने प्रदर्शन करते हुए सरकार से ‘कंबाला’ पर से प्रतिबंध हटाने की मांग की है। बता दें कि कंबाला तटीय क्षेत्र में सालाना आयोजित होने वाला पारंपरिक भैंसा दौड़ है। सभी कॉलेजों के छात्र संगठनों, कलाकारों, नेता और तुलुनाद रक्षणा वेदिके के सदस्यों ने यहां हंपनकट्टा में प्रदर्शन किया।
अभिनेता देवदास कपीकड, नवीन डी पाडिल, भोजराज वामनजूर, निर्माता-निर्देशक विजय कुमार कोडेलबेल, भाजपा सदस्य नलिन कुमार कतिल और कांग्रेस विधायक मोहीउद्दीन बावा सहित तेलगू फिल्म जगत की मशहूर हस्तियों ने कंबाला के आयोजन को सुनिश्चित करने के लिए सरकार से फौरन कार्रवाई की मांग की है। विभिन्न कॉलेजों के छात्रों ने मानव शृंखला बनाई।
कतिल ने कहा कि कंबाला का 800 साल का इतिहास है और यह तुलुनाडु की परंपरा है। गौरतलब है कि तुलु एक द्रविड़ भाषा है, जो एक छोटे से क्षेत्र में, मुख्य तौर पर तटीय कर्नाटक और केरल के कासरगोड जिले में बोली जाती है, जिसे सामूहिक रूप से तुलु नाडू के नाम से जाना जाता है। उन्होंने बताया कि छात्र पारंपरिक भैंसा दौड़ को बचाने के लिए जमा हुए। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘पेटा’ पारंपरिक भैंसा दौड़ को गलत रूप में पेश करते हुए दावा कर रही है कि भैंसों से निर्दयता बरती गई है, जबकि उनके साथ अच्छा व्यवहार होना चाहिए।

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