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Tuesday, 25 April 2017

शहादत का जिम्मेदार कौन !

छत्तीसगढ़ में बस्तर की धरती नक्सली हमले से भी खून से लाल हो गई है। घटना नक्सलियों के गढ़ सुकमा से 64 किलोमीटर दूर दोरनापाल के कुरकापाल में हुई। सुरक्षाबल और नक्सली मुठभेड़ में अभी तक 2 दर्जन से अधिक सीआरपीएफ के जवानों की मौत  होने की खबर है। पिछले माह 11 मार्च को भी 12 जवान शहीद हो गये हैं। बताया जाता है कि 74 वीं सीआरपीएफ की बटालियन सड़क की सुरक्षा के लिए तैनात थी जब जवान भोजन कर रहे थे तभी अचानक  नक्सलियों ने हमला कर दिया सबसे उल्लेखनीय तथ्य तो यही है कि नक्सलियों ने हमला वहीं किया था जहां 2011 में सीआरपीएफ के 76 जवानों की शहादत हुई थी। एक बार फिर नक्सलियों ने एम्बुश लगाकर जवानों पर हमला किया।
छत्तीसगढ़ में नक्सली वारदात कम होने का नाम नहीं ले रही है। सीआईपीएफ के 76 जवानों की शहादत को देश के सबसे बड़े नक्सली हमले के रूप में देखा गया था। फिर झीरम घाटी हमले में कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं, सुरक्षाबलों सहित अन्य लोगों की शहादत हुई थी पर राज्य सरकार नक्सली और समर्थकों के आत्मसमपर्ण कर अपनी ही पीठं ठोंकने में ही व्यस्त रही है। हाल फिलहाल नक्सलियों के बस्तर सहित छत्तीसगढ़ में जल्दी, खात्मे का दावा किया जाता रहा पर हालात सामने हैं। छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य ही है कि यहां गृहमंत्री की पदस्थापना की योग्यता आदिवासी होना ही है और सरकार रामविचार नेताम के हारने के बाद आदिवासी नेता रामसेवक पैकेरा को गृहमंत्री बनाया है उनकी न तो आदिवासियों में पकड़ है न ही पुलिस अफसरों पर ! छत्तीसगढ़ के कितने वरिष्ठ अफसर बस्तर में रात्रि विश्राम कर अपनी जान जोखिम में डालनेवाले सुरक्षाबल के लोगों का मनोबल बढ़ाते हैं? सरकार ने छग में स्पेशल डीजी नक्सली के पद पर नई पदस्थापना की है पर वे कभी नक्सली क्षेत्र में पदस्थ ही नहीं रहे हैं यह कम चौंकाने बात नहीं है। प्रदेश के पुलिस मुखिया की कार्यप्रणाली भी चर्चा में रही है उनका अफसरों पर नियंत्रण नहीं है । दो आईजी स्तर के अफसरों की कार्यप्रणाली उनके नेतृत्व को लगातार चुनौती देती जा रही है। बस्तर में पहले पदस्थ एसआरपी कल्लूरी ने सैकड़ों नक्सलियों और समर्थकों का आत्मसमपर्ण कराकर वाहवाही लूटी पर उन पर कुछ गंभीर आरोप लगे और राज्य सरकार को उन्हें हटाना भी पड़ा।
सवाल फिर यही उठता है कि केन्द्रीय सुरक्षाबल और छग पुलिस के बीच क्या तालमेल का अभाव है, क्या नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन के लिए संयुक्त रणनीति बनती है ! हाल ही के मामले में एम्बुश की नक्सलियों ने योजना बनाई थी, और यह तय है कि बिना स्थानीय लोगों की जानकारी के यह संभव भी नहीं है। फिर नक्सलियों से आम आदिवासी दूर हो गया है यह दावा कैसे किया जाता है? सूत्र कहते हैं कि करीब 300 नक्सलियों ने हमला किया, धरना स्थल पर 99 सीआईपीएफ के जवान मौजूद थे। सवाल फिर उठता है कि इतने अधिक नक्सलियों का जमावड़ा हुआ था और सुरक्षाबल तथा इंटेलीजेन्स बेखबर कैसे था? 
कुल मिलाकर दो दर्जन से अधिक जवान शहीद हो गये, फिर 'शहादत पर गर्वÓ है, शहादत बेकार नहीं जाएगी। मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। ऐसे कुछ बयान जारी होंगे और श्रद्धांजलि दी जाएगी तथा फिर किसी अन्य घटना की प्रतीक्षा की जाएगी।

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