वेदों और पुराणों में सबसे बड़ा पाप किसी के मन को आघात पहुंचाने को माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि किसी भी मनुष्य को किसी अन्य मनुष्य से ऐसी कोई भी बात नहीं करनी चाहिए जिससे कि उसे ठेस पहुंचें । क्योंकि किसी का उपहास उड़ाना मतलब धीमे संकटको आमंत्रण देना है । हम आपको आज ऐसी कहानी बताने जा रहे हैं, जिसमें एक बच्चे का किया गया उपहास, बहुत बड़ी मुसीबत का कारण बना ।
अश्वत्थामा का उड़ाया उपहास
साथ ही किसी का उपहास उड़ाकर उसे नीचा दिखाना भी पाप की श्रेणी में सबसे ऊपर आता है, क्योंकि एक छोटी-सी बात किसी मनुष्य को किस तरह आहत कर सकती है इससे जुड़ी एक कहानी महाभारत में मिलती है । द्रोण पुत्र का उपहास उड़ाया गया था, जिसके बाद द्रोण ने वो किया, जिसकी किसी को आस भी नहीं थी ।अश्वत्थामा का अपमान
महाभारत में वर्णित एक कहानी के अनुसार गुरू द्रोणाचार्य को अपने पुत्र अश्वत्थामा के साथ किए गए एक उपहास ने इतना आहत कर दिया था कि उन्होंने इस उपहास का प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा कर ली । और द्रोण के गुस्से का कारण बना समस्त द्रुपद साम्राज्य ।
गुरु द्रोण और द्रुपद
ये उस समय की बात है जब गुरू द्रोणाचार्य पाडंवों और कौरवों के गुरू के रूप में नियुक्त नहीं हुए थे। द्रोणाचार्य की शिक्षा-दीक्षा द्रुपद के साथ एक गुरूकुल में हुई थी। दोनों साथ साथ ही खेलते थे ।
द्रोण की निर्धनता
दोनों बाल्यावस्था से ही एक दूसरे के मित्र थे। शिक्षा-दीक्षा पूरी होने के बाद द्रुपद पांचाल देश के राजा बन गए जबकि द्रोण को जीविका निर्वाह के लिए कोई साधन नहीं मिल पाया। द्रोण बेहद हीनता का जीवन व्यतीत कर रहे थे ।
गुरू द्रोण का विवशता
गुरू द्रोण के दिन घोर गरीबी में बीत रहे थे। वे अपनी पत्नी और पुत्र अश्वत्थामा के लिए दो वक्त की रोजी-रोटी का भी प्रबंध नहीं कर सकते थे। अश्वत्थामा पांचाल देश के राजा के बालकों के साथ खेला करता था। इस दौरान अपनी पत्नी के कहने पर गुरू द्रोण ने राजा दुपद्र से सहायता मांगने का निश्चय किया
घटना देख सन्न रहे गये द्रोण
द्रोण राजा के दरबार में जा ही रहे थे कि अचानक उन्होंने एक घटना देखी। वहां पास में ही द्रोण ने अपने पुत्र अश्वत्थामा को कुछ पेय पदार्थ पीते देखा । द्रोण ने थोड़ा पास जाकर देखा तो वो सन्न रह गये ।
अश्वत्थामा का उपहास
द्रोण पुत्र अश्वत्थामा को द्रुपद राजवंश के कुछ बालक दूध पिला रहे थे। लेकिन वास्तव में दूध नहीं था बल्कि वो बालक अश्वत्थामा का मजाकर उड़ाने के लिए कुछ और ही पीला रहे थे । साथ ही जोर जोर से बालक अश्वत्थामा की तरफ देखकर हंस रहे थे ।
अनभिज्ञ था अश्वत्थामा
जब गुरू द्रोण ने समीप आकर देखा तो वास्तव में वो दूध नहीं बल्कि चावल के आटे को पानी में मिलाकर बनाया गया पदार्थ था। सभी बच्चे अश्वत्थामा का उपहास उड़ा रहे थे जबकि बालक अश्वत्थामा को ये अपने साथ हुए छल के बारे में ज्ञात ही नहीं था।
अश्वत्थामा का भोलापन
बालक अश्वत्थामा बड़ा प्रसन्न होते हुए अपने पिता द्रोण के समीप आया और बोला‘पिताजी, मैंने आज दूध पिया। मेरी आत्मा तृप्त हो गई’ अपने पुत्र के इस भोलेपन को देखकर गुरू द्रोण के आंसू छलक पड़े । ग्रुरु द्रोण को अपनी निर्धनता और विवशता पर बहुत दुख हुआ ।
द्रोण पहुंचे द्रुपद के पास
लेकिन पुत्र का मजाक बनाने से उन्हें पीड़ा के साथ गुस्सा भी आया । अपने दुख को दबाते हुए वो इसकी शिकायत करने राजा दुपद्र के पास पहुंचे। राजा दुपद्र ने गुरू द्रोण की बात को गंभीरता से न लेते हुए उनका उपहास उड़ाना शुरू कर दिया।
द्रोण का अपमान
द्रुपद ने अपने ही मित्र का भरी सभा में मजाक उड़ाना शुरु कर दिया । अपने मित्र के मुख से ऐसे कटु वचन सुनकर गुरू द्रोण को बहुत क्रोध आया। और उसके बाद द्रोण ने जो प्रतिज्ञा ली, उससे द्रुपद भी भयभीत हो गया ।प्रतिशोध की प्रतिज्ञा
उन्होंने अपने अपमान और अपने पुत्र अश्वत्थामा के साथ हुए छल का प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा कर ली। उन्होंने इसके लिए अर्जुन को विशेष रूप से प्रशिक्षण दिया। जिससे कि भविष्य में राजा दुपद्र को उनके किए का दंड मिल सके…
गुरुदक्षिणा में मांगा द्रुपद का राज्य
उसके बाद उसी अर्जुन से गुरु द्रोण ने दक्षिणा के तौर पर द्रुपद का राज्य मांगा । अर्जुन ने द्रुपद को हराकर उनका समस्त राज्य गुरु द्रोण के चरणों में डाल दिया । द्रुपद अब खुद को अपमानित महसूस कर रहा था ।
पुरा हुआ प्रतिशोध
द्रुपद के पास अब कुछ भी नहीं था । जबकि गुरु द्रोण के पास पूरा राज्य था लेकिन द्रोण ने अपना आधा राज्य द्रुपद को दे दिया, जिससे बाद द्रुपद पानी पानी हो गया और इस तरह गुरु द्रोण का प्रतिशोध पुरा हुआ ।
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