शिक्षा प्राप्त करने और किसी को शिक्षित करने की कोई उम्र नहीं होती है. बस मन में कुछ करने की ललक हो तो नन्ही उम्र में भी शिक्षा का अलख जगाकर किसी की भी जिंदगी को रोशन किया जा सकता है.
मध्य प्रदेश के सीहोर की कोठरी स्थित शासकीय कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास विद्यालय की कक्षा 8 वीं में पढ़ने वाली सुलोचना कुछ ऐसा ही कर लोगों की जिंदगी में बदलाव ला रही है.
सीहोर जिले की अाष्टा तहसील के पगारिया हाट में रहने वाली सुलोचना की कहानी हर किसी के लिए मिसाल है. सुलोचना ने जब जिंदगी के मायने भी नहीं समझे थे कि उसके सिर से माता-पिता का साया उठ गया. अनाथ सुलोचना को बड़ी बहन ने शुरूआत में गांव में पढ़ाया और फिर बेहतर भविष्य के लिए कोठरी स्थित शासकीय कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास विद्यालय में भर्ती कर दिया.
सुलोचना पिछले कई साल से इसी छात्रावास में रहकर पढ़ाई कर रही है. कच्ची उम्र में अनाथ होने का दर्द झेल रही सुलोचना ने अपने इसी 'दर्द' को दूसरे लोगों को खुशियां देने के इरादे में बदल दिया. सुलोचना ने ठान लिया की वह समाज से अशिक्षा को मिटाकर प्रत्येक निरक्षर को अक्षर ज्ञान देकर खुद एक आदर्श शिक्षिका बनेगी.
छात्रवास के चपरासियों से शुरू हुआ मिशन
नन्ही साक्षर दूत को सबसे पहले अपने छात्रावास की दो महिला चपरासियों को देख उन्हें साक्षर करने का ख्याल आया. सुलोचना ने उन्हें पढ़ने के लिए राजी किया. उन्हें काम के दौरान ही पढ़ाई कराके पहले अक्षर ज्ञान और फिर दस्तखत करना भी सिखला दिया.
छात्रावास से शुरू हुई शिक्षा की रोशनी से अब पूरा गांव रोशन हो रहा है. आज लगभग एक दर्जन निरक्षर लोगों को यह नन्ही दूत साक्षर कर रही है. गांव के मोटर मैकेनिक से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक हर कोई सुलोचना का स्टूडेंट है.
सुलोचना की वजह से होता है खुद पर गर्व
छात्रावास में कार्यरत गीता बाई भी उन लोगों में शामिल है, जिन्होंने सुलोचना की मदद से पढ़ना-लिखना सीखा. अधेड़ उम्र में साक्षर बनी गीता का कहना है कि पहले जिंदगी में शिक्षा की कमी महसूस होती थी. अब अपना हाथों से खुद का नाम लिखने से गर्व महसूस होता है.
ग्रामीणों के लिए बनी रोल मॉडल
छात्रावास की अधीक्षिका मधुबाला पाठक को भी अपनी इस स्टूडेंट पर गर्व है. वो बताती हैं कि साक्षरता मिशन के साथ सुलोचना ने अपने गांव में महिलाओं की जिंदगी में बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाई है. उसने महिलाओं को घूंघट प्रथा से मुक्ति दिलाने के लिए जागरूकता अभियान चलाया तो शौचालय बनाने के लिए मुहिम चलाकर उन्हें शर्मिंदगी से भी निजात दिलाई.

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