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Monday, 19 December 2016

कलावा बांधने का है वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व, इन्होंने की थी इस परंपरा की शुरुआत

हिंदु धर्म में पूजा-पाठ के बाद कलावा बांधा जाता है। पूजा के सभी नियमों में कलावा बांधने का भी एक नियम होता है। कई बार आपके मन  में भी कलावा बांधने को लेकर सवाल भी उठते होंगे कि आखिर ये कलावा बांधा क्यों जाता है?  दरअसल कलावा यानी रक्षा सूत्रो को कलाई पर बांधने के वैज्ञानिक और धार्मिक दोनों महत्व है। कलावा बांधने से आपको क्या कुछ स्वास्थ्य लभ होता है आइये जानते हैं।

शास्त्रों के मुताबिक कलावा यानी रक्षा सूत्र बांधने की परंपर की कहानी देवी लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी है। कहते हैं इसके शुरुआत इने दोनों ने ही की थी।

ऐसी मान्यता है कि कलावा बांधने से आपकी रक्षा होती है। इसे आपका रक्षा सूत्र कहा जाता है। कहा जाता है कि इसे कलाई पर बांधने से जीवन में आने वाले संकट से रक्षा होती है।

कलावा के बारे में एक मान्यता ये भी है कि इसे बांधने से तीनों देवों – ब्रह्मा, विष्णु और महेश की कृपा बनती है। साथ ही तीनों देवियों सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की भी कृपा मिलती है।

वहीं वेदों में लिखा है कि वृत्रासुर से युद्ध के लिये जाते समय इंद्राणी शची ने भी इंद्र की दाहिनी भुजा पर रक्षासूत्र (जिसे मौली या कलावा भी कहते हैं) बांधा था। जिससे वृत्रासुर को मारकर इंद्र विजयी बने और तभी से रक्षासूत्र या मौली बांधने की प्रथा शुरू हुई।

मौली का धागा कच्चे सूत से बनाया जाता है और यह कई रंगों जैसे, लाल, पीला, सफेद या नारंगी आदि का होता है। मान्यता है कि इसे हाथों पर बांधने से बरक्कत भी होती है।

विज्ञान की मानें तो शरीर के विभिन्न अंगो तक पहुंचने वाली नसे कलाई से होकर गुजरती हैं।  जब कलाई पर मौली या कलावा बांधा जाता है तो इससे इन नसों की क्रिया नियंत्रित होती हैं।

इससे त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) को काबू किया जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि कलावा बांधने से रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और लकवा जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से काफी हद तक बचाव होता है।

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